इतिहास

शाजापुर को शाहजहां के समय में पहचान मिली। इस क्षेत्र के प्राकृतिक सोंदर्य को देखकर शाहजहां की फौज ने यहां एक पड़ाव लेने का फैसला किया। इस जगह “खांखरा खेडी” के रूप में जानी जाती थी। शाहजहां और उनकी फौज को यह जगह बहुत ज्यादा पसंद आयी और फलस्वरूप जब शाहजहां सम्राट बने तब अपने दक्षिणी अभियान के लिए इस जगह को महत्व दिया ऐसा माना जाता । सन 1640 में मीर बिगो कोटवाल यहाँ के रूप में नियुक्त किया गया है। श्री जगन्नाथ रावल के साथ उन्होंने यहं चार दिशाओं में चार द्वार निर्मित कराये। केंद्र में एक व्यापार केंद्र विकसित किया गया था। नतीजतन इस क्षेत्र में धीरे-धीरे आबादी बढी और यह नगर में परिवर्तित हो गया। इस जगह के आसपास एक दीवार भी बनाई गई थी। राजा ने शाहजहां के सम्मान में ईसे “शाहजहांपुर” के रूप में नामित किया गया। शाहजहांपुर में बारह क्षेत्र मगरिया, महुपुरा, डाँसी, मुरादपुर, वजीरपुरा, कमरीदपुरा, लालपुरा, दायरा, मुगलपुरा, गोल्याखेड़ी, जुगनबाड़ी और मीरकला स्थित थे। मुरादपुर शाहजहां के बेटे के नाम पर रखा गया था। यह कहा जाता है कि चंद्रलेखा नदी (अब चिलर है) पहले उत्तरी दिशा में बहती थी लेकिन विशाल किले की स्थापना के बाद, किले की सुरक्षा के लिए किले की एक परिखा के रूप में पूर्व से लाया गया था । शाहजहां के समय (1628-1658) में जामा मस्जिद, कई सारे मंदिर आदि विकसित किए गए। वे किये गये विकास से बहुत संतुष्ट थे और मोजा मगरिया की जागीर देकर श्री जगन्नाथ रावल सम्मानित किया। लेकिन औरंगजेब के समय (1656-1707) में, इस क्षेत्र को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया था। मुग़ल वंश के पतन के बाद, शाहजहांपुर 1732 में सिंधिया राज्य में लाया गया था और कई सारे प्रशासनिक बदलाव किये गये। नाम “शाहजहांपुर” इस अवधि में “शाजापुर” किया गया था। किले में एक सुंदर महल भी ताराबाई द्वारा विकसित किया गया था। 1904 में यह एक जिले के रूप में घोषित किया गया था।