संस्कृति एवं विरासत

कंस वदोत्सव:

कंस वदोत्सव 150 से अधिक वर्षों से यहाँ मनाया जा रहा है। लोगों में सोमवारिया बज़ार में आयोजित होने वाले कंस वदोत्सव को लेकर अत्यधिक उत्साह दिखाई देता है। यह धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व के एक नाटक है। लोग दशमी रात के को शाजापुर में कंस वदोत्सव मनाते हैं। मथुरा के बाद यह शाजापुर, मध्यप्रदेश में मनाया जाता है। यह कहा जाता है कि कंस वदोत्सव के इतिहास गोवर्धन मंदिर से संबंधित है । पहले कंस वदोत्सव को कंस लीला के नाम से भी जाना जाता। कंस वदोत्सव में लोग भगवान श्रीकृष्ण और सैनिकों की भूमिका निभाते है। श्रीकृष्ण भगवान और उनके सैनिकों नगर मे भ्रमण कर्ते है तथा वद-संवाद बोलते हैं लोग इन्हे एकाग्रता के साथ देखते है। जुलुस आधी रात को ठीक 12 बजे कंस चोराहे पर पहुँचता है।

राजराजेश्वरी माता मंदिर:

यह शाजापुर की ऐतिहासिक जगह है। शाजापुर आगरा-मुंबई राष्ट्रीय राजमार्ग तथा चीलर नदी के तट पर स्थित है. राजराजेश्वरी माता मंदिर भी चीलर नदी के तट पर स्थित है। प्राचीन इतिहास के अनुसार, 300 साल पहले सन 1781 में मनीबाइ पलटन ने 4 बिघा 2 बिस्वा भूमी दान दी थी। सन 1791 ताराबाई 4106 /- रुपये मंदिर निर्माण के लिये दान दिये। मूर्ति की ऊंचाई 6 फीट है, मंदिर के सामने सन 1734 सभा मंडप का निर्माण किया गया। मंदिर में ऋद्धि-सिद्धि और गणपति की मूर्तियां भी स्थापित की गयी हैं। एक कुआं भी मंदिर का क्षेत्र में है। धर्मशाला भी भक्तों द्वारा निर्मित की गई है। यह मंदिर आस्था का केंद्र है।

करेड़ी माता:

करेड़ी माता मंदिर शाजापुर से 10 किमी दूर है। यह मंदिर भी कंकावती माता के रूप में जाना जाता है। करेड़ी माता मंदिर मालवा के मुख्य पूजा स्थल है। यह मंदिर महाभारत समय के राजा कर्ण द्वारा स्थापित किया गया था। माता के कंधे पर एक जलकुंड है, जो हर समय पानी से पूरी तरह से भरा हुआ रहता है। श्रधालु अलग-अलग स्थानों से करेड़ी माता के दर्शन के लिए आते हैं। सांप के निशान भी मूर्तियां पर मौजूद हैं। रंगपंचमी के दौरान मंगलवार को यहां मेला भी आयोजित किया जाता हैं। यहां भी महादेव मंदिर है , जो इस मंदिर से ऊपर है। चम्पा पेड़ इस मंदिर के सामने है। कई मूर्तियों पर “नाग चिन्ह” पाया जाता है जो नागवंशी वंश का संकेतक है।

पार्श्वनाथ मंदिर:

यह भारत में प्रसिद्ध मंदिर में से एक है। ईस मंदिर का क्षेत्रफल जैन समुदाय के दो पंथ दिगंबर-श्वेताम्बर तथा वैषणवी देवी के मंदिरों के क्षेत्रफल के आधे के बराबर है। मुख्य मंदिर में पार्शवनाथ भगवान की मूर्ति है। जैन समुदाय के दो पंथ हैं अर्थात् श्वेताम्बर और दिगम्बर, जैन तीर्थ स्थल करीब 2000 साल पुराना है। मंदिर के सभी दीवारें गीली हैं, यह कहा जाता है की इस मंदिर के क्षेत्र में मे चोरी असंभव है।